Sunday, January 14, 2018

41

सेहरा की दोपहर में नमी बन के रहना 
आदमी को मुश्किल है आदमी बन के रहना 

मैं बरसूंगा एक दिन आखिरी बूँद तक 
तुम खेत सी सूखी ज़मी बन के रहना 

तस्वीर ज़िन्दगी की मुकम्मल नहीं हो जिससे 
वो रंग बन के रहना वो कमी बन के रहना 

ये सितारे खूब  रश्क़  करते हैं फिर भी 
चाँद को आता है लाज़मी बन के रहना 

Friday, January 5, 2018

40

ये सांसे यूँ ही चलनी है, ये उम्र यूँ ही निकालनी है
ज़रा बैठो  तसल्ली से, मुझे कुछ बात करनी है

अभी तुम कह नहीं सकते के मंज़िल पास है मेरे
अभी ये रेलगाड़ी कितने शहरो से गुज़ारनी है

कई फ़रियाद ले के मैं गया था उसके दर लेकिन
खुदा मसरूफ इतना है , उसे कहाँ मेरी  सुननी  है

मुझे घर की फ़िकर  है रात भर सोने नहीं देती
कहीं दरवाज़ा टूटा है कहीं खिड़की बदलनी है

मेरे मेहमान सारे जश्न ए फुरकत और देखेंगे
के मेरी रुह भी मेरे लहू के साथ जलनी  है

Wednesday, December 27, 2017

39

एक मुद्दत से शहर ए  दिल्ली में ,
होशवाले नज़र नहीं आये

उसके दरवाज़े तक तो आये थे हम ,
और अंदर मगर नहीं आये

क्या सितम है के तेरी महफ़िल में
धड़ तो आये सर नहीं आये

उन परिंदो का फिक्रमंद हूँ  जो
शाम से अपने घर नहीं आये

ये सफर साथ तय किया हमने
वक़्त आया तो तुम  नहीं आये


एक शख़्श पे तुमने जां  बिछा दी है
क्या होगा वो अगर नहीं आये

Tuesday, December 26, 2017

38

तेरे हर ख़्वाब में मेरा भी बसेरा करना
यहाँ मुमकिन नहीं हर शब को सवेरा करना

कितना मुश्किल है उस शख़्स को मेरा करना
कितना मुश्किल है उस शख़्स को तेरा करना

मुझको एक उम्र लगी जुगनुओं को लाने में
तुमको आसान था इस घर में अँधेरा करना

इन परिंदों को भला किसने बताया होगा
कहाँ उड़ना और किस शाख़ पे डेरा करना

बादलों हो अगर तो जंग ए आफ़ताब करो
तुमसे होता है सिर्फ़ चाँद का घेरा करना

36

तुम बेवजह बदनाम करोगे
मालूम था ये काम करोगे

ज़िंदगी काफ़ी न थी मेरी
अब नींद भी हराम करोगे

मैं बनाता हूँ महल रेत का
तुम बारिश तमाम करोगे

ये ज़िद भी क्या ज़िद है
तुम्हीं सुबह तुम्हीं शाम करोगे

गुज़र जाने दो मुझे फिर
इंशाल्लाह आराम करोगे

35

बस धुआँ है जहाँ तक नज़र जाए
 हाल एसा हो तो आदमी किधर जाए

एक ख़्वाहिश है के मेरी खुदी के आगे
वो भी  टूटे और टूट के बिखर जाए

अब मेरी अपनी कोई मंज़िल ही नहीं
चला जाता हूँ के जिस तरफ़ शहर जाए

और रहता भी किस तरह में घर में अपने
घर मुझसे ये कहता है अपने घर जाए

कहाँ तन्हाई का आलम कहाँ आदत तेरी
ये तो हम है मियाँ, वरना तो कोई मर जाए

Wednesday, December 20, 2017

33

शब ए बहार का और कितना इन्तज़ार करें
अब और क्या करें जाना ,चलो प्यार करें

इससे पहले के बदल जाए मिज़ाज ए वफ़ा
हम वफ़ादारी का आपस में एक क़रार करें

वो सो रहा है जिससे हमको है वहशत
अभी ये वक़्त है बुज़दिल के उस पे वार करें

जाँनिसार मुझको समझ ना कभी मेरे हमदम
जाँ बची ही कहाँ है जो जाँ निसार करें

ये अंजुमन बड़े रसूख़ की नुमाया है
यहाँ हर एक आदमी का शौक़ है शिकार करें

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सेहरा की दोपहर में नमी बन के रहना  आदमी को मुश्किल है आदमी बन के रहना  मैं बरसूंगा एक दिन आखिरी बूँद तक  तुम खेत सी सूखी ज़मी बन के रहना...

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