Monday, November 13, 2017

24

ये उसकी दूर होने की सफ़ाई है 
थोड़ी मजबूरी थोड़ी बेवफ़ाई है 
कल तलक जान थी वो मेरी
आज मेरी  जान पे बन आइ है 

हुस्न वाले धोखा देंगे अक्सर 
बुज़ुर्गों की सलाह में सच्चाई है
बहुत दिनो बाद हूँ घर लौटा
कुछ किताबों से धूल हटाई है 

मेरा लुटना तेरे शहर में आकर
मेरे इश्क़ की कमाई है 
चुपचाप मेरे कान में सच कह जा
एसी भी क्या रूसवाई है

क्या ख़्वाब ए मोहब्बत मेरा था
क्या हक़ीक़त तूने दिखाई है
हम कभी एक हो नहीं सकते
बात देर से समझ आइ है

23

सब मरासिम नहीं हैं साथ निभाने के लिए 
कई होते हैं इस दिल को दुखाने के लिये

तेरी महफ़िल में मेरा काम सिर्फ़ इतना है 
लोग कुछ चाहिए बस भीड़ बढ़ाने के लिए

मुझसे मिलना तेरा और मुझसे दूर हो जाना
इतना काफ़ी है इस जान के जाने के लिए

जो ज़माना कभी ना तेरा था ना मेरा था
तूने छोड़ा मुझे उस शान ए ज़माने के लिए

कई मिलते मेरी बात समझने वाले 
नहीं मिलता है कोई साथ निभाने के लिए

Saturday, November 11, 2017

22

मुहब्बत करता है, मुहब्बत समझता है
एसा शख़्स आजकल कहाँ मिलता है
मैंने रूह तक झाँक कर देखा है
इश्क़ बेरंग है, पर हर घड़ी रंग बदलता है
तुम्हारे होने से होता भी तो क्या होता
शाम अब भी होती है, दिन अब भी ढलता है
और इस शहर को छोड़ के जाता कहाँ
वो हवा बदलने के लिए घर बदलता है
हुज़ूर मोम है या फ़ौलाद क्या मालूम
आफ़ताब के आगे तो सब पिघलता है
माँग लेना माफ़ी खुदा से एक रोज़
अभी इश्क़ में हो, अभी सब चलता है

21

निगाहों निगाहों में मिलते रहे हम
न तुमने कहा कुछ न मेने सुनाया
वो दूरी कहाँ थी, वो कुछ फासले थे
न तुम आगे आयी न मैं आगे आया

न तुम थीं अकेले, न मैं था अकेले
थे चारों  तरफ बस सवालों के घेरे
खुद ही सवालों में उलझे रहे हम
न तुमको मिला कुछ न मैंने  ही पाया.

लकीरों को दोषी कहें भी तो कब तक
ये हालात आखिर सहें भी तो कब तक
ये बातें किताबी सबक बन रहीं हैं
न अपना है कोई न कोई पराया.

20

इस रात की गहराई में कुछ, आवाज़ बदलती जाती है
एक सन्नाटा सा पसरा है, ख़ामोशी सी छा जाती है ..
कुछ टप टप करती बूदें हैं, कुछ आड़े तिरछे साये हैं
ये मेरा ही घर लगता है, फिर नींद कहाँ खो जाती है.

वो अक्सर मुझसे पूछते हैं, कोई राज़ तुम्हारे दिल में है
मैं अपने दिल से पूछ रहा, क्यों नौबत ऐसी  आती है.
ये  लोग पुराने कहते हैं, सपने भी सच्चे होते हैं,
वो आंख लगाकर बेठे हैं,बस उम्र गुज़रती जाती है.

Thursday, July 14, 2016

19

तेरी नज़र , नज़ारे बहुत हैं.
समंदर एक है, किनारे बहुत हैं
यारों पे अख्तियार रखता हूँ
गिर भी गया तो सहारे बहुत हैं
छोड़ दो लफ्ज़ इस शाम में
दो आँखें हैं, इशारे बहुत हैं
कोई उम्मीद नहीं सच की साहब
इस शहर में तुम्हारे बहुत हैं ,
चाँद मुबारक हो आशिक़ों को
मेरे इश्क़ को सितारे बहुत हैं 

18

साल बदलता है, दिन बदलता नहीं
इस शहर का सूरज, रात में भी ढलता नहीं
गुफ्तगू क्या होगी इन महफ़िलो में साहब
सब कहते हैं, कोई सुनता नहीं
तेरी याद, तेरी बात, तेरा चेहरा,और वो रात
कुछ भी तो दिल से निकलता नहीं
बड़ा सख्त है मेरा नसीब लिखने वाला
लाख रोने से भी बेदर्द पिघलता नहीं
मुझको मुक़द्दर की दुहाई न दे दोस्त
खुदा और मोहब्बत आदमी चुनता नहीं
तू बन तो बन चाँद के मानिंद
तारे कई हैं , कोई गिनता नहीं

Recent

24

ये उसकी दूर होने की सफ़ाई है  थोड़ी मजबूरी थोड़ी बेवफ़ाई है  कल तलक जान थी वो मेरी आज मेरी  जान पे बन आइ है  हुस्न वाले धोखा देंगे अक्...

Popular